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Suddhant deekshit at hirdu kavyashala

ग़ज़ल: चाह कर अब हो नहीं पाउँगा मिर्ची की तरह। घेर रक्खा है मुझे दुनिया ने चींटी की तरह।। घूरती और नोंचती रहती है मुझको हर निगाह, बन गया हूँ मैं हक़ीक़त कह के लड़की की तरह।। जिस्म त...