gyanendra mohan gyan at hirdu kavyashala

 शाहजहांपुर से सुप्रसिद्ध शायर एवं गीतकार श्री ज्ञानेंद्र मोहन ज्ञान साहब के नवगीत संग्रह 'तुमसे मिलकर' से एक गीत "तुम क्या जानो" आप सभी की नज़्र...

तुम क्या जानो : ज्ञानेन्द्र मोहन 'ज्ञान'


तुम क्या जानो कितना दर्द लिए फिरता हूँ,
तुमने तो मेरा आवारापन देखा है।

कदम कदम पर मैंने
अपने जीवन की
बाज़ी हारी है।
सारे रिश्ते-नातों पर
यूँ सहज नहीं
ठोकर मारी है।
किसने कब
कितनी चोटें दीं
याद नहीं है।
इसीलिए
जीवन में कुछ
उन्माद नहीं है।

यहाँ रहे हैं कितने जंगल नागफनी के,
तुमने तो मेरा सूना आँगन देखा है।...

शौक नहीं है
सीने पर
पत्थर रखने का।
मेरा भी मन
होता होगा
कुछ कहने का।
मेरे भी मन में
यह चाह
मचलती होगी।
जी भर प्यार करूँ
यह इच्छा
पलती होगी।

टुकड़े-टुकड़े होकर मैं कितना बिखरा हूँ,
तुमने तो केवल टूटा दर्पण देखा है।...

अब मुझसे तुम
प्रीति लगाने की
मत सोचो।
इस मरुथल में
फूल उगाने की
मत सोचो।
हमदर्दी की बात
मुझे
गाली लगती है।
दुनियाँ की हर जगह
मुझे
खाली लगती है।

थक जाओगे तुम भी मेरे साथ न चलना,
तुमने तो यह चलता-फिरता तन देखा है।...

- ज्ञानेन्द्र मोहन 'ज्ञान'

Comments

  1. धन्यवाद प्रिय... शिवम शर्मा 'गुमनाम'...💐💐💐💐💐

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