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| वेदऋचा माथुर (बदायूं) |
ग़ज़ल - अभी मैं अमावस कहाँ हो गईं हूँ...
दुखों की अजब दास्ताँ हो गई हूँ।
तुम्हारे लिए आसमाँ हो गई हूँ।।
जहाँ सिर छुपाते हैं ग़म सारे आ के,
मैं उजड़ा हुआ इक मकाँ हो गई हूँ।।
न सोचों मुझे जब नहीं मिट सकूंगी,
नया रंग बन कर रवाँ हो गई हूँ।।
जिसे दर्द नें एक सौगात दी है,
मैं वो खूबसूरत जहाँ हो गई हूँ।।
कभी चाँदनी भी मेरा साथ देगी,
अभी मैं अमावस कहाँ हो गई हूँ।।
- वेदऋचा माथुर
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