ansar qumbari at hirdu


आइए चलते हैं उस शायर के हुज़ूर जिसका नाम ही शायरी को परिभाषित करने के लिए काफी है...जिसनें अपना पूरा जीवन काव्यजगत को समर्पित कर दिया... जहाँ एक तरफ़ राम और अल्लाह के नाम पर लोग तलवार उठाने को आमादा रहते हैं वहीँ देश के इस बड़े शायर का मानना है कि "हिन्दू होना बहुत आसान है मुस्लिम होना भी बहुत आसान है मगर इंसान होना बहुत मुश्किल है" जी हाँ हम बात कर रहे हैं मशहूर - ओ - मारूफ़ शायर जनाब अंसार क़म्बरी साहब की जिन्होनें इस मुश्किल काम को बेहद आसानी से अंजाम दिया... पेश है अंसार साहब की एक खूबसूरत सी ग़ज़ल उनके चाहने वालों के नाम.... 
मगर ग़ज़ल से पहले अंसार साहब के कुछ दोहे...
बाल्मीकि के जाप से, निकला ये परिणाम
श्रद्धा होनी चाहिए, मरा कहो या राम।।
वो चाहें आशीष दें, चाहें मारें बाण
रघुनंदन के तीर से, होता है कल्याण।।
सूफी संत चले गए, सब जंगल की ओर।
मंदिर मस्जिद में मिले, रंग बिरंगे चोर।।
राजनीति का व्याकरण, कुर्सी वाला पाठ।
पढ़ा रहे हैं सब हमें, सोलह दूनी आठ।।
सागर से रखती नहीं, सीपी कोई आस।
एक स्वाति की बूँद से, बुझ जाती है प्यास।।
रखता जो सदभावना,होता वो इंसान।
दुराभाव से आदमी,बन जाता शैतान।।
सफ़ल वाही है आजकल, वही हुआ सिरमौर
जिसकी कथनी और है, जिसकी करनी और।।
कोई कजरी गा रहा, कोई गाए फाग
अपनी–अपनी ढपलियाँ, अपना–अपना राग।।
या ये उसकी सौत है, या वो इसकी सौत। 
इस करवट है ज़िन्दगी, उस करवट है मौत।
भ्रम न कभी तुम पालना, इस दुनिया का यार।
दिन जीवन के 'क़म्बरी', मिलते हैं दो-चार।।

 
पेश - ए - ख़िदमत है ग़ज़ल...
जहाँ पर आपका आभास होगा।
वहाँ पतझार भी मधुमास होगा।।
यूँ ही होता नहीं लहरों में कम्पन,
कोई प्यासा नदी के पास होगा।।
मेरे घर मंथरा है , कैकेयी है,
मुझे भी एक दिन वनवास होगा।।
जो हम लड़ते रहे भाषा को लेकर,
कोई ग़ालिब न तुलसीदास होगा।।
अगर होंगी कहीं वैभव की बातें,
कटे हाथों का भी इतिहास होगा।।
- डा. अंसार क़म्बरी 

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Comments

  1. बहुत उम्दा दोहे सृजन किये हैं एवं ग़ज़ल भी उत्कृष्ट कोटी की है। सादर नमन।

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