dushyant kumar at hirdu kavyshala
आज मिलते हैं
ग़ज़लों के ऐसे हस्ताक्षर से जिन्हें ग़ज़लों को हिंदी-भाषियों में लोक्रप्रिय करने का
श्रेय दिया जाता है...हम बात कर रहे हैं अपने ख़ास अंदाज़ से नए लहजे की शायरी करने वाले
मशहूर – ओ – मारूफ़ शायर दुष्यंत कुमार से...
पेश है उनकी एक बहुचर्चित ग़ज़ल...
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| दुष्यंत कुमार |
ग़ज़ल –
हो गई है पीर
पर्वत-सी पिघलनी चाहिए!
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए!!
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए!!
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए!!
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए!!
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए!!
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए!!
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए!!
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए!!
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए!!
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए!!
- दुष्यंत कुमार
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