Nida fazli at hirdu kavyashala
मरहूम निदा फ़ाज़ली साहब का एक गीत और एक ग़ज़ल...
गीत:
तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है...
जहाँ भी जाऊँ ये लगता है, तेरी महफ़िल है...
ये आसमान ये बादल ये रास्ते ये हवा...
हर एक चीज़ है अपनी जगह ठिकाने पे।
कई दिनों से शिकायत नहीं ज़माने से।।
ये ज़िंदगी है सफ़र तू सफ़र कि मंज़िल है, जहाँ भी ...
हर एक फूल किसी याद सा महकता है...
तेरे खयाल से जागी हुई फ़िज़ाएं हैं।
ये सब्ज़ पेड़ हैं या प्यार की दुआएं हैं।।
तू पास हो कि नहीं फिर भी तू मुकाबिल है, जहाँ भी ...
हर एक शय है मुहब्बत के नूर से रोशन...
ये रोशनी जो ना हो ज़िंदगी अधूरी है।
राह-ए-वफ़ा में कोई हमसफ़र ज़रूरी है।।
ये रास्ता कहीं तनहा कटे तो मुश्किल है, जहाँ भी ...
तेरे बगैर जहाँ में कोई कमी सी थी...
भटक रही थी जवानी अंधेरी राहों में।
सुकून दिल को मिला आ के तेरी बाहों में।।
मैं एक खोई हुई मौज हूँ तू साहिल है, जहाँ भी ...
तेरे जमाल से रोशन है कायनात मेरी...
मेरी तलाश तेरी दिलकशी रहे बाकी।
खुदा करे की ये दीवानगी रहे बाकी।
तेरी वफ़ा ही मेरी हर खुशी का हासिल है, जहाँ भी ...
ग़ज़ल:
होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है।
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िन्दगी क्या चीज़ है।।
उन से नज़रें क्या मिली रोशन फिजाएँ हो गईं।
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है।।
ख़ुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी,
झुकती आँखों ने बताया मयकशी क्या चीज़ है।।
हम लबों से कह न पाये उन से हाल-ए-दिल कभी,
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है।।
- निदा फ़ाज़ली
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