hamko kalandar kahaa gaya

:ग़ज़ल संख्या 1 : इक बंजारा करता क्या...
धूप का जंगल, नंगे पावों इक बंजारा करता क्या
रेत के दरिया, रेत के झरने प्यास का मारा करता क्या
बादल-बादल आग लगी थी, छाया तरसे छाया को
पत्ता-पत्ता सूख चुका था पेड़ बेचारा करता क्या
सब उसके आँगन में अपनी राम कहानी कहते थे
बोल नहीं सकता था कुछ भी घर-चौबारा करता क्या
तुमने चाहे चाँद-सितारे, हमको मोती लाने थे,
हम दोनों की राह अलग थी साथ तुम्हारा करता क्या
ये है तेरी और न मेरी दुनिया आनी-जानी है
तेरा-मेरा, इसका-उसका, फिर बंटवारा करता क्या
टूट गये जब बंधन सारे और किनारे छूट गये
बींच भंवर में मैंने उसका नाम पुकारा करता क्या

 :ग़ज़ल संख्या 2 : जिंदा रहे तो हमको कलंदर कहा गया...

ज़िन्दा रहे तो हमको क़लन्दर कहा गया
सूली पे चढ़ गये तो पयम्बर कहा गया
ऐसा हमारे दौर में अक्सर कहा गया
पत्थर को मोम, मोम को पत्थर कहा गया
ख़ुद अपनी पीठ ठोंक ली कुछ मिल गया अगर
जब कुछ नहीं मिला तो मुक़द्दर कहा गया
वैसे तो ये भी आम मकानों की तरह था
तुम साथ हो लिये तो इसे घर कहा गया
जिस रोज़ तेरी आँख ज़रा डबडबा गयी
क़तरे को उसी दिन से समन्दर कहा गया
जो रात छोड़ दिन में भी करता है रहज़नी
ऐसे सफेद पोश को रहबर कहा गया

डा. अंसार क़म्बरी, मशहूर शायर
संरक्षक, हिर्दू फाउंडेशन

आप भी अपनी रचनाएँ हमें भेज सकते हैं...
ई-मेल :
hirdukavyashala555@gmail.com

हिर्दू फाउंडेशन से जुड़ें:
: वेबसाइट : इंस्टाग्राम : फेसबुक :

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:

 शिवम् शर्मा गुमनाम (संस्थापक एवं सचिव)
 रश्मि द्विवेदी (अध्यक्षा)
वैभव पालीवाल (उपाध्यक्ष)
 दीप्ति वर्मा (संस्थापक सदस्य)
संपर्क सूत्र : 7080786182, 9889697675

Comments

Popular posts from this blog

lakho sadme dhero gham by azm shakiri

Bahut khoobsurat ho tum by tahir faraz at hirdu

Agnivesh shukla at hirdu kavyashala