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vedricha at hirdu kavyashala

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वेदऋचा माथुर (बदायूं)   आज मिलते हैं बदायूँ से हिंदी-उर्दू मिश्रित ग़ज़लों की जानी मानी शायरा कु. वेदऋचा माथुर साहिबा से... शाइरी में वेदऋचा अपना एक अलग लहज़ा रखती हैं जो उन्हें शायराओं की फेहरिस्त में एक अलग और ख़ास मुकाम देता है... मल्लिका – ए – तरन्नुम वेदऋचा की एक ख़ूबसूरत सी ग़ज़ल तमाम शायरीपसंद लोगो के लिए... ग़ज़ल - अभी मैं अमावस कहाँ हो गईं हूँ ... दुखों की अजब दास्ताँ हो गई हूँ । तुम्हारे लिए आसमाँ हो गई हूँ । । जहाँ सिर छुपाते हैं ग़म सारे आ के, मैं उजड़ा हुआ इक मकाँ हो गई हूँ । । न सोचों मुझे जब नहीं मिट सकूंगी, नया रंग बन कर रवाँ हो गई हूँ । । जिसे दर्द नें एक सौगात दी है, मैं वो खूबसूरत जहाँ हो गई हूँ । । कभी चाँदनी भी मेरा साथ देगी, अभी मैं अमावस कहाँ हो गई हूँ । । - वेदऋचा माथुर हिर्दू काव्यशाला से जुड़ने के लिए संपर्क करें - शिवम् शर्मा ''गुमनाम''  सह - संस्थापक  एवं  संतोष शाह  सह - संस्थापक  संपर्क सूत्र - 9889697675, 8299565686, 8896914889 ई-मेल- hirdukavyashala555@gmail.com

dheeraj singh chandan at hirdu kavyashala

आज मिलतें हैं देश के मशहूर गीतकार (श्रृंगार) धीरज सिंह "चंदन" से... अपने ख़ास लहजे से नौजवानों के दिलों में एक ख़ास जगह रखते हैं चंदन जी...उनके तमाम चाहने वालों के नाम उनका बेहद लोकप्रिय गीत... वो भी पहले प्यार के लिए... गीत मै गाऊंगा पहले प्यार के लिए... सोचता हूँ उम्र का हिसाब जोड़ लूँ, यादों के बगीचे से गुलाब तोड़ लूँ, उलझनों की चादर समेट लू ज़रा,  तकिये को सीने से लपेट लू ज़रा, सोलह बरस की पहचान के लिए, जान से भी प्यारी उस जान के लिए, खुशियों के नये संसार के लिए,  गीत मै गाऊँगा ... किसी अनछुए एहसास के लिए, बावरे थे किसी की तलाश लिए,  कॉलेज किताबें थीं कहानी के लिए,  पहला कदम था जवानी के लिए, कुदरत खेल भी दिखाने लगी थी,  सजना संवरना सिखाने लगी थी, आइनें पे चढ़ते खुमार के लिए,  गीत मै गाऊँगा ... मूलधन ब्याज के बवालों में पड़े, मौन थे गणित के सवालों में खड़े, ख़ामोशी को तोड़ बदनाम हो गये, आगे वाली सीट के गुलाम हो गये,  रेशम से बालों के शिकार हो गये, कान की दो बालियों में नैन खो गये, पल दो पल के दीदार के लिए,   गीत मै गा...

sheetal bajpai at hirdu kavyashala

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आज की मुलाक़ात कानपुर की सुप्रसिद्ध कवयित्री डा. शीतल बाजपई जी से... पेश है उनका एक लोकप्रिय गीत अम्मा तुम अब भी घर में हो … डा. शीतल बाजपई (कानपुर) अम्मा तुम अब भी घर में हो। देखो ना!   इन दीवारों पर परछाईं   तेरी दिखती है। आँगन की अलगनियों पर साड़ी भी सूखा करती है। अब भी अचार की महक तुम्हारी भंडरिया से आती है। अब भी लगता है फुकनी से , तू चूल्हे को सुलगाती है। तुम दिल में और नज़र में हो... अम्मा तुम अब भी घर में हो. . . हर रोज सुबह लगता मुझको , तुम अभी कहीं से आओगी । जो भी बेमन का देखोगी , झूठा गुस्सा दिखलाओगी । जब कानों पर तकिया रख कर , हम डाँट तुम्हारी टालेंगे , पापा को आने दो , कह कर तब फिर हमको धमकाओगी।। तुम मन के झूठे डर में हो... अम्मा तुम अब भी घर में हो... हर गर्मी में , हर छुट्टी में , बिटिया को कौन बुलायेगा। आयेगी जब वो घर अपने , तो दिल से कौन लगायेगा । सर्दी में स्वेटर , दस्ताने , टोपी , मोजे सब बुन-बुन कर । डाँट - डाँट के ठंडक में , अब कौन हमें पहनायेगा ।। यादों के हर मंजर में हो... अम्मा तुम अब भी घर में हो... ...

gyanendra mohan gyan at hirdu kavyashala

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 शाहजहांपुर से सुप्रसिद्ध शायर एवं गीतकार श्री ज्ञानेंद्र मोहन ज्ञान साहब के नवगीत संग्रह 'तुमसे मिलकर' से एक गीत "तुम क्या जानो" आप सभी की नज़्र... तुम क्या जानो : ज्ञानेन्द्र मोहन 'ज्ञान' तुम क्या जानो कितना दर्द लिए फिरता हूँ, तुमने तो मेरा आवारापन देखा है। कदम कदम पर मैंने अपने जीवन की बाज़ी हारी है। सारे रिश्ते-नातों पर यूँ सहज नहीं ठोकर मारी है। किसने कब कितनी चोटें दीं याद नहीं है। इसीलिए जीवन में कुछ उन्माद नहीं है। यहाँ रहे हैं कितने जंगल नागफनी के, तुमने तो मेरा सूना आँगन देखा है।... शौक नहीं है सीने पर पत्थर रखने का। मेरा भी मन होता होगा कुछ कहने का। मेरे भी मन में यह चाह मचलती होगी। जी भर प्यार करूँ यह इच्छा पलती होगी। टुकड़े-टुकड़े होकर मैं कितना बिखरा हूँ, तुमने तो केवल टूटा दर्पण देखा है।... अब मुझसे तुम प्रीति लगाने की मत सोचो। इस मरुथल में फूल उगाने की मत सोचो। हमदर्दी की बात मुझे गाली लगती है। दुनियाँ की हर जगह मुझे खाली लगती है। थक जाओगे तुम भी मेरे साथ न चलना, तुमने तो यह चलता-फिरता ...

late pramod tiwari at hirdu kavyashala

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आज हिर्दू काव्यशाला के वेब मंच (www.hirdukavyashala.com) का शुभारम्भ होना है... आज आशीर्वाद प्राप्त करते हैं उनका जिनकी प्रेरणा से हिर्दू का गठन हुआ... जी हाँ हम बात कर रहे हैं स्म्रतिशेष राष्ट्रीय कवि एवं गीतकार प्रमोद तिवारी जी की... जन्म- ३१/०१/१९६० जन्म स्थान - कानपुर प्रमुख कृतियाँ- सलाखों में ख्वाब, मैं आवारा बादल... प्रतिनिधि गीत/ग़ज़ल- याद बहुत आते हैं गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन, टॉफ़ी गीत, अगर देश से प्यार करते हो पंडित, चांदनी में आग लग गयी चाँद जल के रख हो गया... निधन - ११/०३/२०१८ (वाहन दुर्घटना) अपने ढंग से जीना छोड़ दिया... अपनी दुनिया में अब अपने ढंग से जीना छोड़ दिया सबको बहुत शिकायत थी लो मैंने पीना छोड़ दिया... छोड़ दिया लहराकर गाना और झूमना मस्ती में मझधारों में खूब तैरना और डूबना कस्ती में तट केखातिर बीच भँवर में फंसा सफीना छोड़ दिया... सुबह समय पर सोकर उठना रात समय पर सो जाना और जरूरत के मौके पर अनायास ही खो जाना इसकी उसकी फटी चदरिया मैंने सीना छोड़ दिया... भूला दिल की बोली बानी होश में हरदम रहता हूँ जो सुनना है बस ...

aks samastipuri at hirdu kavyashala

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आज मिलते हैं एक ऐसे मशहूर शायर से जिसकी उम्र देखकर बड़े - बड़े शायर दांतों तले उँगलियाँ दबा लिया करते हैं... जी हाँ हम बात कर रहें आपके अपने महबूब शायर जनाब अक्स समस्तीपुरी साहब की... पेश - ए - ख़िदमत है उनकी एक ख़ूबसूरत सी ग़ज़ल... कुछ एक रोज़ में मैं चाहतें बदलता हूँ । अगर न सीट मिले तो बसें बदलता हूँ । । हर एक रोज़ वो पहचान कैसे लेती है, हर एक रोज़ तो मैं आहटें बदलता हूँ । । हमेशा तुमको शिकायत रही जमाऊं न हक़, तो सुन लो आज मैं अपनी हदें बदलता हूँ । । कराहती हैं ये बिस्तर की सिलवटें मेरी, तमाम रात मैं यूँ करवटें बदलता हूँ । । ख़ुदा का शुक्र है आदत नहीं बने हो तुम, कुछ एक रोज़ में मैं आदतें बदलता हूँ । । - अक्स समस्तीपुरी

banaj kumar banaj at hirdu kavyashala

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आज मिलते हैं देश के सुप्रसिद्ध कवि एवं गीतकार श्री बनज कुमार ‘बनज’ जी से... आनंद लेते बनज साहब के कुछ दोहों का... हंस सवारी हाथ में , वीणा की झंकार। वर दे माँ मैं कर सकूँ , गीतों का शृंगार।। भाई चारे से बना , गिरता देख मकान। राजनी ति के आ गई , चेहरे पर मुस्कान।। चोटिल पनघट हो गए , घायल हैं सब ताल। अब पानी इस गाँव का , नहीं रहा वाचाल।। करता हूँ बाहर इसे , रोज़ पकड़ कर हाथ। घर ले आता है समय , मगर उदासी साथ।। मरने की फ़ुर्सत मुझे , मत देना भगवान्। मुझे खोलने हैं कई , अब भी रोशनदान।। आज हवा के साथ में , घूम रही थी आग। वर्ना यूँ जलता नहीं , बस्ती का अनुराग।। बर्फ़ अपाहिज़ की तरह , करती थी बर्ताव। देख धूप ने दे दिए , उसे हज़ारों पाँव।। रंग फूल ख़ुशबू कली , था मेरा परिवार। जाने कैसे हो गए , शामिल इसमें ख़ार।। अधर तुम्हारे हो गये , बिना छुए ही लाल। लिया दिया कुछ भी नहीं , कैसे हुआ कमाल।। बीच सफ़र से चल दिया ऐसे मेरा ख़्वाब , आधी पढ़कर छोड़ दे जैसे कोई किताब।। - बनज कुमार ‘बनज’