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suryakant tripathi nirala at hirdu kavyshala

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आज मिलते हैं छायावाद युग के स्तंभ कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी से... सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की कुछ प्रमुख कृतियाँ गीतिका, परिमल, अनामिका, कुकुरमुत्ता, अणिमा आदि हैं...आपके समक्ष है निराला जी की एक बहुचर्चित कविता... सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कविता – दिवसावसान का समय- मेघमय आसमान से उतर रही है वह संध्या-सुन्दरी , परी सी , धीरे , धीरे , धीरे तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास , मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर , किंतु ज़रा गंभीर , नहीं है उसमें हास-विलास। हँसता है तो केवल तारा एक- गुँथा हुआ उन घुँघराले काले-काले बालों से , हृदय राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक। अलसता की-सी लता , किंतु कोमलता की वह कली , सखी-नीरवता के कंधे पर डाले बाँह , छाँह सी अम्बर-पथ से चली। नहीं बजती उसके हाथ में कोई वीणा , नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप , नूपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन नहीं , सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा ' चुप चुप चुप ' है गूँज रहा सब कहीं- व्योम मंडल में , जगतीतल में- सोती शान्त सरोवर पर उस अमल कमलिनी-दल में- सौंदर्य-गर्विता-सरिता के अति विस्तृ...

dushyant kumar at hirdu kavyshala

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आज मिलते हैं ग़ज़लों के ऐसे हस्ताक्षर से जिन्हें ग़ज़लों को हिंदी-भाषियों में लोक्रप्रिय करने का श्रेय दिया जाता है...हम बात कर रहे हैं अपने ख़ास अंदाज़ से नए लहजे की शायरी करने वाले मशहूर – ओ – मारूफ़ शायर दुष्यंत कुमार से... पेश है उनकी एक बहुचर्चित ग़ज़ल... दुष्यंत कुमार ग़ज़ल – हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए ! इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए !! आज यह दीवार , परदों की तरह हिलने लगी , शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए !! हर सड़क पर , हर गली में , हर नगर , हर गाँव में , हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए !! सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं , मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए !! मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही , हो कहीं भी आग , लेकिन आग जलनी चाहिए !! - दुष्यंत कुमार हिर्दू काव्यशाला से जुड़ें – शिवम् शर्मा गुमनाम (सह-संस्थापक) संतोष शाह (सह-संस्थापक) रश्मि द्विवेदी (अध्यक्षा) संपर्क सूत्र – 8896914889, 9889697675, 8299565686  

parveen shakir at hirdu kavyshala

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आज उर्दू अदब की उस बा – कमाल शायरा के रू-ब-रू होते हैं जिसने आप अपनी पूरी ज़िंदगी शायरी के नाम कर दी... हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान की मशहूर शायरा मोहतरमा परवीन शाकिर साहिबा की... पेश – ए – ख़िदमत हैं उनके चाहने वालों के नाम उनकी एक बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल... परवीन शाकिर   ग़ज़ल: जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे! चाँद के हमराह हम हर शब सफ़र करते रहे!!  रास्तों का इल्म था हम को न सम्तों की ख़बर, शहर-ए-ना-मालूम की चाहत मगर करते रहे!! हम ने ख़ुद से भी छुपाया और सारे शहर को, तेरे जाने की ख़बर दीवार-ओ-दर करते रहे!! वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी, इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे!!  आज आया है हमें भी उन उड़ानों का ख़याल, जिन को तेरे ज़ोम में बे-बाल-ओ-पर करते रहे!!   - परवीन शाकिर '' हिर्दू काव्यशाला ''   से जुड़ें...   संतोष शाह   (सह-संस्थापक) शिवम् शर्मा "गुमनाम"   (सह-संस्थापक) रश्मि द्विवेदी   (अध्यक्षा) संपर्क सूत्र -   8896914889 , 8299565686 , 9889697675